सक्ती जिला

जिला मुख्यालय बनने के बाद भी आयोजनों से वंचित सक्ती नगरवासी, बढ़ता जा रहा असंतोष, जिला बनने के बाद भी उपेक्षा का शिकार हो रहा है नगर

सक्ति नगरवासी आयोजनों से दूर, जेठा में होने वाले कार्यक्रमों से बढ़ी नाराज़गी —

सक्ती। जिला बनने के बाद नगरवासियों में यह उम्मीद जगी थी कि अब शहर को नई पहचान और सक्रियता मिलेगी। मगर हकीकत इसके उलट साबित हो रही है। जिला बनने के बाद से अब तक सभी बड़े सरकारी आयोजन — चाहे स्वतंत्रता दिवस हो, गणतंत्र दिवस या राज्योत्सव — सक्ती नगर से आठ किलोमीटर दूर जेठा में किए जा रहे हैं। इस निर्णय ने नगरवासियों को निराश और हताश कर दिया है।

नगर के नागरिकों का कहना है कि जब जिले का मुख्यालय सक्ती है, तो जिले के सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी यहीं होने चाहिए। परंतु बार-बार जेठा में आयोजन किए जाने से शहर का सूनापन बढ़ता जा रहा है। व्यापारी, विद्यार्थी और सामाजिक संगठन इसे नगर की उपेक्षा मान रहे हैं।

कभी सक्ती का मैदान गूंजता था…

जिला बनने से पहले गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस का आयोजन जनपद स्तर पर सक्ती में ही हुआ करता था। उस समय स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थी, शिक्षण संस्थान, व्यापारी और आम नागरिक बड़ी संख्या में शामिल होकर अपने नगर की गरिमा बढ़ाते थे। नगर के प्रमुख मैदानों में सांस्कृतिक कार्यक्रम और परेड देखने हजारों लोग पहुंचते थे। लेकिन अब वह उत्साह और सहभागिता गायब हो चुकी है।

जेठा तक पहुंचना आसान नहीं –

नगरवासियों की सबसे बड़ी व्यथा यह है कि जेठा तक पहुंचने के लिए साधन नहीं हैं। शहर से आठ किलोमीटर दूर तक जाने के लिए न तो पर्याप्त परिवहन सुविधा है और न ही स्थानीय व्यवस्था। जिन बुजुर्गों, महिलाओं और विद्यार्थियों को उत्सवों में शामिल होना चाहिए था, वे अब सिर्फ अखबारों या टीवी पर ही सरकारी आयोजन देख पाते हैं।

जनप्रतिनिधि और प्रशासन मौन –

नगरवासियों ने कई बार इस विषय पर अपनी भावना जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाई। स्थानीय संगठनों ने यह सुझाव भी दिया कि नगर के पास या नगर के किसी खुले मैदान में कार्यक्रम की स्थाई रूप से व्यवस्था किया जाए ताकि भविष्य में सभी बड़े कार्यक्रम यहीं हों। लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

जनता का कहना है कि यह केवल आयोजन स्थल का प्रश्न नहीं, बल्कि नगर की अस्मिता और सम्मान से जुड़ा मामला है। जिला मुख्यालय के नाम पर बने सक्ती नगर को अब भी उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है।

जिला बना, पर लाभ नहीं मिला –

लोगों का कहना है कि जब से सक्ती जिला बना है, प्रशासनिक कार्यालय तो खुले हैं पर नगर जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रमुख आयोजन, सभाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम सब बाहर हो रहे हैं। यदि यही स्थिति रही, तो “जिला बनने” का लाभ केवल कागज़ों में रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं दिखेगा।

जनभावना को समझना होगा –

सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक मंचों का मानना है कि अब जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को नगर की भावनाओं का सम्मान करते हुए निर्णायक कदम उठाना चाहिए। आयोजनों को शहर के भीतर लाने से न केवल नागरिक सहभागिता बढ़ेगी, बल्कि यह नगर के गौरव और आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना भी होगी।

नगरवासियों ने कहा कि “सक्ति जिला बनने की खुशी अब फीकी पड़ने लगी है। लोग कह रहे हैं — अगर हमारे अपने ही नगर में कार्यक्रम नहीं होंगे तो जिला बनने का अर्थ ही क्या? प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अब नगर की आवाज़ सुननी चाहिए।”

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