जांजगीर-नैला दुर्गा उत्सव: लाखों की भीड़ में गूंजते जयकारे, लेकिन नागरिक सुरक्षा और महिला सम्मान पर उठ रहे गंभीर सवाल – आस्था का सैलाब कहीं बेबस आँसुओं में न बदल जाए

जांजगीर-नैला। मां दुर्गा का पावन दरबार, रोशनी से जगमगाते पंडाल और श्रद्धालुओं का उमड़ा जनसैलाब… यह दृश्य किसी भी भक्त को भाव-विभोर कर देने वाला है। हर ओर “जय माता दी” के स्वर गूंज रहे हैं, आस्था और भक्ति की बयार बह रही है। लेकिन इस अलौकिक नजारे के बीच कुछ कड़वे सच भी हैं, जिन पर नज़र डालना ज़रूरी है।
नैला के दुर्गा उत्सव में हर साल बढ़ती लाखों की भीड़ नागरिक सुरक्षा की दृष्टि से प्रशासन को नई चुनौती दे रही है। भीड़ का रेला इतना विशाल हो चुका है कि नियंत्रण लगभग असंभव लगता है। श्रद्धालुओं को पार्किंग स्थल से तीन-तीन किलोमीटर पैदल चलकर दरबार तक पहुँचना पड़ता है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों की मजबूरियाँ भीड़ के इस समुद्र में खो जाती हैं।
सबसे बड़ी चिंता का विषय महिलाओं की सुरक्षा है। दूर-दराज़ से पहुंचने वाली माताएं, बहनें और बेटियाँ जब आस्था के साथ दुर्गा मां के दर्शन के लिए आती हैं, तो उन्हें भीड़ में धक्का-मुक्की, असुविधा और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह प्रश्न हर किसी को झकझोरता है कि मां दुर्गा के दरबार में आने वाली नारी को ही अगर सुरक्षा का अभाव महसूस हो, तो फिर इस आयोजन की भव्यता का क्या अर्थ रह जाता है?
श्रद्धा और भक्ति का यह उत्सव निश्चित रूप से हमारी परंपरा की धरोहर है, लेकिन इसकी सफलता तभी है जब हर नागरिक सुरक्षित महसूस करे। प्रशासन के सामने यह बड़ी जिम्मेदारी है कि आस्था की इस भीड़ में कोई भी महिला असुरक्षित न महसूस करे, कोई भी बुजुर्ग थकान से जूझता न दिखे और कोई भी बच्चा डरकर मां का हाथ न छोड़े।
अब आवश्यकता है कि दुर्गा उत्सव को शहर के भीड़-भाड़ वाले इलाकों से बाहर स्थानांतरित किया जाए, जहाँ सुरक्षा, पार्किंग और व्यवस्था का बेहतर प्रबंधन हो सके। वरना वह दिन दूर नहीं जब यह आस्था का महासागर किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बनकर हमेशा के लिए निशान छोड़ जाएगा।
मां दुर्गा के दरबार में उमड़ती श्रद्धा और भक्ति की यह लहर सुरक्षित वातावरण में ही सार्थक होगी। प्रशासन को आज ही ठोस कदम उठाने होंगे ताकि आस्था का उत्सव बेबस आंसुओं में न बदल जाए।




