सक्ती: जनसुनवाई बनी विरोध का मंच: डुमरपारा में खदान के खिलाफ फूटा जनाक्रोश, जवाब नहीं दे पाए जिम्मेदार अधिकारी, 209 सागौन पेड़ों की कटाई से लेकर “सेटिंग” तक गंभीर आरोप

प्रशासन की चुप्पी से बढ़ा अविश्वास
सक्ती। जिले के डुमरपारा क्षेत्र में प्रस्तावित एमआरएस मिनरल्स की डोलोमाइट खदान अब बड़े जनविरोध का केंद्र बन गई है। पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए आयोजित जनसुनवाई बुधवार को भारी हंगामे, तीखे सवालों और प्रशासन के प्रति गहरे अविश्वास के बीच संपन्न हुई। जनसुनवाई का मंच जैसे ही शुरू हुआ, वैसे ही ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा और पूरा क्षेत्र विरोध के नारों से गूंज उठा। जिले के जनप्रतिनिधियों से लेकन क्षेत्र के तमाम के नेताओं ने भी पहुंचकर विरोध किया और कहा कि यहद एमआरएस मिनरल्स की खदान खुलती है तो इसका जन आंदोलन के साथ जवाब दिया जाएगा। जिला पंचायत सदस्य, पूर्व विधायक और भाजपा के तमाम नेताओं ने विरोध दर्ज कराया लेकिन अधिकारियों ने कोई जवाब तक नहीं दिया।
जंगल के बीच जनसुनवाई पर उठे सवाल, “आवाज दबाने की साजिश” का आरोप :-
ग्रामीणों तथा जिले भर से आए नेताओं और आमजनों ने जनसुनवाई स्थल को लेकर सबसे पहले आपत्ति जताई। उनका आरोप था कि कार्यक्रम को सुनियोजित तरीके से घने जंगल के बीच आयोजित किया गया, ताकि अधिक से अधिक लोग इसमें शामिल न हो सकें और विरोध की तीव्रता कम दिखाई जाए। ग्रामीणों ने इसे “जनभागीदारी को सीमित करने की साजिश” करार दिया। इसके बावजूद दूर-दराज के गांवों से सैकड़ों लोग मौके पर पहुंचे और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए जनसुनवाई की प्रक्रिया को ही अवैध और पक्षपातपूर्ण बताया।
अधिकारियों के जवाब नहीं, चुप्पी ही बनी सबसे बड़ा सवाल-
जनसुनवाई के दौरान जब ग्रामीणों ने खदान से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव, जल स्रोतों पर असर, वन्य जीवों के विस्थापन और स्वास्थ्य संबंधी खतरे जैसे मुद्दे उठाए, तो उपस्थित अधिकारी संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। कई महत्वपूर्ण सवालों पर अधिकारियों की चुप्पी ने माहौल को और भड़का दिया।
ग्रामीणों तथा विरोध करने वालों का आरोप था कि अधिकारी जानबूझकर स्पष्ट जवाब देने से बचते रहे और केवल औपचारिकता निभाते नजर आए। इससे पूरे आयोजन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए। विरोध कर रहे लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि खदान के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कुछ चुनिंदा लोगों और मीडिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों ने खुले मंच से कहा कि यह जनसुनवाई वास्तविक जनमत जानने के बजाय “पूर्व तय प्रक्रिया” का हिस्सा लग रही है।
209 सागौन पेड़ों की कटाई का मामला फिर गरमाया, वन विभाग पर भी सवाल-
जनसुनवाई में सबसे बड़ा मुद्दा पुरानी घटना को लेकर उठा, जिसमें आरोप है कि इसी खदान से जुड़े संचालक द्वारा वन विभाग की मिलीभगत से 209 नग सागौन (टीक) के पेड़ों की अवैध कटाई कराई गई थी। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब पहले ही इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हो चुकी है और उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो अब उसी परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति देने की प्रक्रिया कैसे शुरू की जा रही है। इस मुद्दे पर भी अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया, जिससे लोगों का आक्रोश और बढ़ गया।
जल, जंगल और जमीन पर संकट, जीवन पर सीधा असर-
ग्रामीणों ने कहा कि डोलोमाइट खदान शुरू होने से क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। जंगलों का क्षरण, जल स्रोतों का सूखना, धूल और प्रदूषण से स्वास्थ्य पर खतरा, और वन्य जीवों का विस्थापन, इन सभी मुद्दों को लेकर लोगों ने गहरी चिंता जताई। स्थानीय किसानों और ग्रामीणों ने साफ कहा कि यह खदान उनकी आजीविका और अस्तित्व पर सीधा हमला है। लोगों को विभिन्न प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ेगा। पहले से संचालित कई खदानों की ब्लास्टिंग से पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंच चुका है। गांव के बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।
भारी पुलिस बल तैनात, फिर भी नहीं थमा विरोध-
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने जनसुनवाई स्थल पर भारी पुलिस बल तैनात किया था। चारों ओर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे, लेकिन इसके बावजूद विरोध लगातार जारी रहा। कई बार माहौल तनावपूर्ण हुआ, लेकिन ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात पर डटे रहे। इस मुद्दे पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने भी ग्रामीणों का समर्थन किया। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि जब तक जनता की आपत्तियों का समाधान नहीं होता और पुराने मामलों की जांच पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी प्रकार की स्वीकृति देना जनहित के खिलाफ होगा। इस अवसर पर भाजपा नेता केशव चंद्रा, कीर्तन चंद्रा, संजय रामचंद्र, अभिषेक शर्मा, अनुभव तिवारी, गेंदराम मनहर, गजेंद्र मोनू राठौर सहित ग्रामीण मौजूद रहे।
“अबकी बार आर-पार की लड़ाई”, आंदोलन तेज करने की चेतावनी
प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी गई है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो आंदोलन को और व्यापक और उग्र रूप दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “जल, जंगल और जमीन” की रक्षा के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं और खदान को किसी भी कीमत पर शुरू नहीं होने देंगे। डुमरपारा की यह जनसुनवाई अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह जनभावनाओं, पर्यावरणीय चिंताओं और प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा बन चुकी है। ग्रामीणों के तीखे विरोध, गंभीर आरोपों और अधिकारियों की चुप्पी ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। अब सबकी नजर प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है कि वह जनआक्रोश को कैसे संभालता है और इस विवादित खदान परियोजना पर क्या फैसला लेता है।
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खदान किसी भी सूरत में नहीं खुलनी चाहिए। पहले ही 209 सागौन के पेड़ काट दिए गए हैं। पूर्व की शिकायतों का कोई निराकरण नहीं किया जा सका है। इस खदान के लिए किसी भी प्रकार की पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए।
श्रीमती द्रौपदी कीर्तन चन्द्रा
अध्यक्ष, जिला पंचायत, सक्ती
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जनसुनवाई में क्षेत्र के लोगों की केवल आपत्तियां दर्ज की जाती है। लोग अपनी बातें रखते हैं। आपत्ति निराकरण पश्चात ही कार्यवाही आगे बढ़ती है।
विरेन्द्र कुमार लकड़ा
एडीएम, जिला-सक्ती
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