आधुनिक दौर में भी नहीं छोड़ी परंपरा — 75 वर्षीय मानमती आज भी बेचती हैं बेर और इमली, सरवानी गांव की बुजुर्ग महिला देशी स्वाद और आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं

सक्ती। सरवानी गांव की 75 वर्षीय मानमती बीते करीब 60 वर्षों से बेर, इमली, आचार और देशी चपाती बेचकर न केवल अपना गुजर-बसर कर रही हैं, बल्कि देशी स्वाद और परंपरा की पहचान को भी जीवित रखे हुए हैं। फास्ट फूड और पैकेटबंद वस्तुओं के इस युग में जब देसी स्वाद धीरे-धीरे बच्चों की पहुंच से दूर होता जा रहा है, तब मानमती का संघर्ष और समर्पण अपने आप में प्रेरणादायक उदाहरण है।
हर सुबह मानमती अपनी छोटी टोकरी में घर पर बने बेर का आचार, खट्टी-मीठी इमली और देशी व्यंजन रखती हैं और आत्मानंद स्कूल के गेट के पास बैठ जाती हैं। सुबह से शाम तक वहीं बैठकर बच्चों और राहगीरों को अपने हाथों की बनी वस्तुएं बेचती हैं। बच्चों को उनके हाथ के बेर और इमली बहुत पसंद आते हैं, जो अब बाजार के स्वाद में नहीं मिलते।
मानमती बताती हैं कि उन्होंने यह काम तब शुरू किया था जब वे किशोरावस्था में थीं। धीरे-धीरे समय बदला, बाजार बदला, पर उन्होंने अपनी परंपरा नहीं छोड़ी। आज भी अपनी मेहनत पर गर्व करती हैं। उनका कहना है — “मेहनत से किया गया काम कभी छोटा नहीं होता, इससे आत्मसम्मान मिलता है।” इस काम में अब उनकी बहुएं भी हाथ बंटाने लगी है। घर परिवार का सपोर्ट आज भी उन्हें मिलता है।
अब उम्र के इस पड़ाव पर भी मानमती की जिजीविषा देखने लायक है। चेहरे पर झुर्रियां हैं लेकिन आत्मनिर्भरता की चमक आज भी बनी हुई है। सादगी, श्रम और संस्कृति से जुड़ाव उनकी पहचान बन चुका है।
सक्ती नगर में मानमती केवल एक विक्रेता नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं — जो यह सिखाती हैं कि सच्चा सम्मान मेहनत और परंपरा निभाने में है, चाहे जमाना कितना भी बदल जाए।




