सक्ती जिला

निमोही में लोहार तालाब पर मिट्टी डाल रेलवे ट्रैक निर्माण का आरोप, शिकायत के बाद कलेक्टर ने दिए जांच के निर्देश

अरुण कुमार निराला । डभरा | क्या अब गांव के तालाब “विकास” की राह में रुकावट बन गए हैं? सक्ती जिले के डभरा क्षेत्र अंतर्गत निमोही ग्राम में कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है, जहां ग्रामीणों ने आरकेएम पावरजेन लिमिटेड पर कोयला परिवहन के लिए रेलवे ट्रैक निर्माण हेतु लोहार तालाब को मिट्टी डालकर पाटने का आरोप लगाया है। मामला जिला कलेक्टर तक पहुंचने के बाद प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है।

ग्रामीणों का कहना है कि जिस तालाब से वर्षों से गांव के मवेशी पानी पीते थे और जो भरी गर्मी में भी पूरी तरह नहीं सूखता था, आज उसी तालाब को मिट्टी से भरने की तैयारी की जा रही है। आरोप है कि प्लांट से जुड़े ठेकेदारों ने तालाब का पानी भी पंप के जरिए बाहर निकाल दिया, जिससे गांव की निस्तारी व्यवस्था प्रभावित होने लगी है।

तालाब था या “विकास” की राह का रोड़ा?
ग्रामीणों का आरोप है कि कोयला परिवहन के लिए रेलवे ट्रैक निर्माण के नाम पर तालाब के बड़े हिस्से में मिट्टी डाली जा चुकी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि कोई जलस्रोत वर्षों से सार्वजनिक उपयोग में रहा है, तो उसे समाप्त करने की अनुमति आखिर कैसे दी जा सकती है?

बताया जा रहा है कि पुराने दस्तावेजों में भूमि निजी दर्ज रही हो, लेकिन वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में संबंधित भूमि तालाब के रूप में अंकित है। ऐसे में मामला और गंभीर माना जा रहा है।


परेशान ग्रामीण
“पहले पानी हटाओ, फिर तालाब… फिर बोलो विकास!”
गांव में चर्चा है कि अब शायद पशुओं को पानी की जगह “विकास” का भाषण सुनकर प्यास बुझानी पड़े। जिस तालाब से गाय-बैल पानी पीते थे, वहां अब कोयले की रेल दौड़ाने की तैयारी की चर्चा है। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि क्या विकास का मतलब प्राकृतिक जलस्रोतों को खत्म करना है?

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन क्या कहती है?
Supreme Court of India ने विभिन्न मामलों में स्पष्ट किया है कि तालाब, पोखर और सार्वजनिक उपयोग के जलस्रोतों को संरक्षित किया जाना चाहिए। यदि किसी जलस्रोत का उपयोग निस्तारी, सिंचाई या सार्वजनिक हित में होता रहा है, तो उसे पाटकर अन्य उपयोग में बदलना गंभीर विषय माना गया है। कई फैसलों में न्यायालय ने जल निकायों को बचाने और अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी प्रशासन की बताई है।

किसान पहुंचे कलेक्टर दरबार
मामले की शिकायत किसानों द्वारा जिला कलेक्टर से किए जाने के बाद प्रशासन हरकत में आया है। जानकारी के अनुसार, सक्ती कलेक्टर ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच कर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

बड़ा सवाल
क्या कोयले की रफ्तार के लिए गांव का जलस्रोत कुर्बान होगा, या प्रशासन तालाब बचाने के लिए सख्त कदम उठाएगा?

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