सक्ती जिला: गरीब खोजो अभियान: करोड़पतियों को राहत, जरूरतमंदों को इंतजार! गरीबों की योजना में अमीरों का कब्जा, मदद की थाली में फिर वही चेहरे!

व्यंग्य लेख!
सक्ती। कहते हैं सरकार की योजनाएं गरीब, असहाय और जरूरतमंदों के लिए बनती हैं। लेकिन लगता है कुछ लोगों ने इस सिद्धांत को बदलकर नया नियम बना दिया है—”जिसके पास जितना ज्यादा है, उसे उतना और दो।”
विगत दिनों जारी आर्थिक सहायता की सूची देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो गरीबी नहीं, बल्कि रसूख ही पात्रता का सबसे बड़ा प्रमाण बन गया हो। जिन लोगों के घरों में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं, जिनके नाम के आगे पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव की लंबी फेहरिस्त है, वे सहायता पाने वालों में शामिल हैं। दूसरी ओर वह व्यक्ति, जो सचमुच बीमारी, बेरोजगारी या आर्थिक तंगी से जूझ रहा है, आज भी उम्मीद की कतार में खड़ा है।
स्थिति यह है कि गरीब आदमी सहायता के लिए आवेदन करता है, जांच होती है, दस्तावेज मांगे जाते हैं, सत्यापन होता है, फाइल घूमती है और अंत में जवाब मिलता है—”पात्रता नहीं बनती।” वहीं कुछ खास लोगों के लिए पात्रता शायद घर बैठे ही बन जाती है।
सूची पर उठ रहे सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि लाभ पाने वालों में अधिकांश ऐसे चेहरे बताए जा रहे हैं जिनका संबंध सत्ता, संगठन या जनप्रतिनिधियों के करीबी दायरों से है। ऐसे में जनता पूछ रही है कि यह आर्थिक सहायता थी या फिर “विशेष परिचय सम्मान योजना”?
सबसे बड़ा व्यंग्य तो यह है कि जिनके नाम पर योजनाएं बनाई जाती हैं, वे गरीब आज भी दर-दर भटक रहे हैं। और जिनके पास पहले से सब कुछ है, वे सरकारी सहायता की छतरी के नीचे सुरक्षित खड़े हैं। ऐसा लगता है मानो गरीबों के हिस्से की रोटी भी प्रभावशाली लोग ही खा रहे हों और फिर मंच से गरीबी उन्मूलन के भाषण भी वही दे रहे हों।
अब सवाल यह नहीं है कि सहायता किसे मिली। सवाल यह है कि क्या वास्तव में गरीब इस व्यवस्था की प्राथमिकता हैं भी या सिर्फ भाषणों और पोस्टरों की शोभा बढ़ाने के लिए बचाकर रखे गए हैं?
क्योंकि जब करोड़पति और लखपति आर्थिक सहायता के पात्र बन जाएं और गरीब केवल दर्शक बनकर रह जाए, तब योजना नहीं, पूरी व्यवस्था कटघरे में खड़ी दिखाई देती है। जनता अब जवाब चाहती है—गरीबों के नाम पर चल रही योजनाओं में आखिर गरीब कहां हैं?




