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सक्ती का गौरव : जोबा आश्रम में मिला दुर्लभ ताम्रपत्र बना आकर्षण का केंद्र, उत्कल लिपि में अंकित तंत्र विद्या संबंधी पांडुलिपि से सक्ती जिले की ऐतिहासिक विरासत को मिली नई पहचान

सक्ती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देशभर में “विकास भी, विरासत भी” के मूल मंत्र को साकार करने की दिशा में प्राचीन धरोहरों, ऐतिहासिक अभिलेखों और सांस्कृतिक विरासतों के संरक्षण एवं खोज के लिए विभिन्न पहल की जा रही हैं। इन्हीं प्रयासों के बीच सक्ती जिले के जोबा आश्रम से एक ऐसी दुर्लभ धरोहर सामने आई है, जिसने इतिहास प्रेमियों, पुरातत्व विशेषज्ञों और आमजन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। यहां एक ताम्रपत्र के रूप में प्राचीन पांडुलिपि प्राप्त हुई है, जिस पर उत्कल लिपि में लेख अंकित हैं और जिसका संबंध तंत्र विद्या से बताया जा रहा है। इस महत्वपूर्ण जानकारी के सामने आने के बाद जिला प्रशासन भी सक्रिय हुआ। प्रशासन की ओर से डिप्टी कलेक्टर अरुण कुमार सोम अपनी टीम के साथ जोबा पहुंचे और वहां संरक्षित इस प्राचीन धरोहर का अवलोकन किया। प्रशासन द्वारा ताम्रपत्र के संरक्षण एवं इसके ऐतिहासिक महत्व के अध्ययन की दिशा में पहल किए जाने को जिले के सांस्कृतिक इतिहास के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

गुरु परंपरा से प्राप्त हुआ ताम्रपत्र : स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज :- 

जोबा आश्रम स्थित महाकाली मंदिर के पुजारी स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज ने बताया कि यह ताम्रपत्र उन्हें गुरु परंपरा के माध्यम से प्राप्त हुआ है। यह धरोहर वर्षों से आश्रम में सुरक्षित रखी गई थी। उन्होंने कहा कि इसकी वास्तविक आयु के संबंध में कोई प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए यह निश्चित रूप से बताना कठिन है कि यह कितने वर्षों पुराना है। बावजूद इसके, इसकी बनावट, लेखन शैली और लिपि को देखते हुए यह अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ प्रतीत होती है। उन्होंने बताया कि गुरु महाराज द्वारा उन्हें यह धरोहर श्रद्धा और विश्वास के साथ सौंपी गई थी तथा वे आज भी गुरु परंपरा के अनुरूप ही अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। उनके अनुसार प्राचीन काल में ताम्रपत्रों का उपयोग ज्ञान, धार्मिक अनुष्ठानों, शास्त्रीय विषयों तथा महत्वपूर्ण सूचनाओं के संरक्षण के लिए किया जाता था।

ऐसे अभियान छिपी हुई धरोहरों को सामने लाएंगे : महाराज :- 

स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे विरासत संरक्षण संबंधी अभियान निश्चित रूप से देश और प्रदेश के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे। उन्होंने कहा कि आज भी अनेक परिवारों, आश्रमों और परंपराओं के पास ऐसी प्राचीन पांडुलिपियां और ताम्रपत्र सुरक्षित हो सकते हैं, जो समय के साथ गुमनामी में चले गए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयासों से छिपी हुई ऐतिहासिक सामग्री सामने आएगी, जिससे नई पीढ़ी अपने अतीत को समझ सकेगी। साथ ही प्राचीन काल में विद्यमान ज्ञान-विज्ञान, तंत्र साधना, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हो सकेंगी।

सक्ती जिले के लिए गौरव का विषय : हरिओम अग्रवाल :- 

पुरातत्व विषय के विशेष जानकार हरिओम अग्रवाल ने इस खोज को सक्ती जिले के लिए अत्यंत गौरवपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र की पहचान केवल उसके वर्तमान विकास से नहीं होती, बल्कि उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत भी उसे विशिष्ट बनाती है।उन्होंने कहा कि महाराज जी द्वारा इस दुर्लभ ताम्रपत्र को वर्षों तक सुरक्षित रखना सराहनीय कार्य है। आज जब अनेक प्राचीन धरोहरें उपेक्षा का शिकार हो रही हैं, ऐसे समय में इस प्रकार के संरक्षण का विशेष महत्व है। उन्होंने प्रशासन की पहल की भी प्रशंसा करते हुए कहा कि यदि विशेषज्ञों द्वारा इसका विधिवत अध्ययन कराया जाए तो क्षेत्र के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

बिना चंदे के वर्षों से संचालित हो रहा है जोबा आश्रम :- 

जोबा आश्रम से जुड़े पंडित देवेंद्र अग्निहोत्री ने बताया कि यह आश्रम वर्षों से सेवा, साधना और आध्यात्मिक परंपराओं का केंद्र बना हुआ है। उन्होंने कहा कि आश्रम किसी प्रकार के अनिवार्य चंदे के आधार पर संचालित नहीं होता, बल्कि श्रद्धालुओं की स्वेच्छा से मिलने वाले सहयोग से यहां की गतिविधियां संचालित की जाती हैं। उन्होंने बताया कि स्वामी दिव्यानंद ओम महाराज लंबे समय से निःस्वार्थ भाव से धार्मिक एवं सामाजिक सेवा में लगे हुए हैं। आश्रम में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन भी समय-समय पर किया जाता है।

वैज्ञानिक अध्ययन से खुल सकते हैं इतिहास के नए अध्याय :- 

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस ताम्रपत्र का वैज्ञानिक परीक्षण, लिपि विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन और पुरातात्विक विश्लेषण कराया जाए तो इसकी वास्तविक समयावधि, उद्देश्य और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है। उत्कल लिपि में लिखित इस प्रकार के अभिलेख क्षेत्रीय इतिहास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा प्राचीन ज्ञान परंपराओं को समझने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। जोबा आश्रम में सुरक्षित यह ताम्रपत्र अब केवल एक धार्मिक धरोहर नहीं रह गया है, बल्कि यह सक्ती जिले की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक बनकर उभरा है। प्रशासन, पुरातत्व विशेषज्ञों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के समन्वित प्रयासों से यदि इसका व्यवस्थित संरक्षण और अध्ययन किया जाता है तो यह खोज आने वाले समय में सक्ती जिले को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला सकती है। इस अवसर पर हरि सिंह क्षत्रिय (कोरबा), देवेन्द्रनाथ अग्निहोत्री, डिप्टी कलेक्टर अरुण कुमार सोम, ग्राम पंचायत के सरपंच देव जायसवाल, जनपद सदस्य (बीडीसी) दिलसाय कंवर, ग्राम सचिव फत्ते साहू, पुरातत्व विशेषज्ञ हरिओम अग्रवाल, जिला पंचायत सक्ती के विकसित भारत अभियान के जिला समन्वयक सुरेश कुमार चौहान तथा हरीश दुबे सहित क्षेत्र के गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने इस दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और इसके महत्व को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया।

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