टपकती छत के नीचे भविष्य तलाश रहे युवा, आखिर ऐसे कैसे लगेंगे सक्ती के युवाओं के सपनों को पंख?

नगर की एकमात्र लाइब्रेरी खुद बदहाली की शिकार, बारिश में पानी से किताबें बचाएं या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करें छात्र; जिम्मेदारों की अनदेखी पर उठे सवाल
सक्ती। हाथों में किताबें, आंखों में सरकारी नौकरी का सपना और सामने टपकती छत…। सक्ती नगर की एकमात्र लाइब्रेरी में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं की यह तस्वीर जिम्मेदार व्यवस्था को आईना दिखाने के लिए काफी है। जिस लाइब्रेरी को युवाओं के भविष्य की नींव मजबूत करनी थी, आज वही बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
बरसात आते ही लाइब्रेरी की स्थिति और खराब हो जाती है। छत से टपकता पानी पढ़ाई में बाधा बन रहा है। युवा यहां अपना भविष्य बनाने आते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाई के साथ बारिश के पानी से बचने की जद्दोजहद भी करनी पड़ रही है। सवाल सीधा है—विद्यार्थी किताबों पर ध्यान दें, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करें या टपकती छत से अपनी किताबें और खुद को बचाते रहें?
जिला मुख्यालय में एकमात्र लाइब्रेरी का यह हाल, फिर युवा जाएं तो जाएं कहां?
सक्ती अब जिला मुख्यालय है। यहां बड़ी संख्या में युवा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। आर्थिक रूप से सक्षम विद्यार्थी बड़े शहरों में जाकर कोचिंग और निजी लाइब्रेरी का सहारा ले सकते हैं, लेकिन सीमित संसाधनों वाले युवाओं के लिए ऐसी सार्वजनिक लाइब्रेरी बेहद महत्वपूर्ण है। विडंबना यह है कि नगर की एकमात्र लाइब्रेरी को ही सुविधाओं और रखरखाव के लिए जूझना पड़ रहा है। यदि युवाओं को पढ़ने के लिए एक सुरक्षित छत और अनुकूल वातावरण तक उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, तो युवा सशक्तिकरण और बेहतर भविष्य की बातें आखिर जमीन पर कैसे उतरेंगी?
रेना जमील की पहल से जगी थी उम्मीद, आज अभावों के बीच सिमट रही व्यवस्था
तत्कालीन एसडीएम रेना जमील की पहल पर कंचनपुर में इस लाइब्रेरी की शुरुआत की गई थी। उद्देश्य था कि सक्ती के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अपने शहर में ही बेहतर अध्ययन का माहौल और आवश्यक संसाधन मिल सकें। शुरुआत ने युवाओं में उम्मीद जगाई, लेकिन आज स्थिति यह है कि जिस पहल को समय के साथ और मजबूत तथा सुविधासंपन्न होना चाहिए था, वह रखरखाव के अभाव में समस्याओं से घिरती दिखाई दे रही है। जिम्मेदारों का पर्याप्त ध्यान नहीं होने का खामियाजा उन युवाओं को भुगतना पड़ रहा है, जिनका इस अव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है।
सवाल केवल टपकती छत का नहीं, युवाओं के भविष्य के प्रति प्राथमिकता का है
मामला महज एक भवन की मरम्मत का नहीं है। सवाल यह है कि युवाओं की पढ़ाई और उनके भविष्य को व्यवस्था अपनी प्राथमिकताओं में आखिर किस स्थान पर रखती है? सरकारी नौकरियों के लिए प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है। युवा दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन यदि उन्हें पढ़ने के लिए न्यूनतम सुविधाएं भी नहीं मिलें तो यह व्यवस्था की गंभीर उदासीनता को दर्शाता है। एक ओर युवाओं को आगे बढ़ाने, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करने और रोजगार से जोड़ने की बातें की जाती हैं, दूसरी ओर टपकती छत के नीचे बैठकर पढ़ते युवा उन तमाम दावों की जमीनी हकीकत बयां कर रहे हैं।
किसी हादसे का इंतजार क्यों? तत्काल सुधार की जरूरत
बारिश के दौरान भवन में पानी का रिसाव केवल असुविधा का विषय नहीं है। लगातार नमी से किताबें, फर्नीचर और भवन भी प्रभावित हो सकते हैं। यदि आसपास बिजली के उपकरण या वायरिंग प्रभावित होती है तो सुरक्षा की दृष्टि से भी स्थिति की जांच जरूरी है। जिम्मेदार विभाग को चाहिए कि तत्काल लाइब्रेरी का निरीक्षण कर छत की मरम्मत, जल रिसाव रोकने, सुरक्षित विद्युत व्यवस्था, पर्याप्त रोशनी, बैठने की बेहतर सुविधा और प्रतियोगी परीक्षाओं की नवीन अध्ययन सामग्री की व्यवस्था सुनिश्चित करे। सक्ती के युवा किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे, वे सिर्फ पढ़ने के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल चाहते हैं। अब देखना यह है कि टपकती छत के नीचे भविष्य तलाश रहे इन युवाओं की परेशानी जिम्मेदारों तक कब पहुंचती है और व्यवस्था कब जागती है।




